
वृंदावन की गलियों में भक्ति का संगीत अक्सर गूंजता है, लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ है. कोई कीर्तन नहीं, कोई रासलीला नहीं… बल्कि एक किताब ने हलचल मचा दी है. ‘परम सुख’—नाम सुनते ही लगता है जैसे जीवन का कोई सीक्रेट कोड मिल गया हो. और जब यह किताब उस संत पर हो जिसने 13 साल की उम्र में घर छोड़कर भगवान की तलाश को अपना करियर बना लिया, तो कहानी अपने आप ‘ट्रेंडिंग’ बन जाती है.
कौन हैं स्वामी प्रेमानंद जी?
कानपुर के एक साधारण परिवार से निकले अनिरुद्ध कुमार पांडेय, आज स्वामी प्रेमानंद जी के नाम से पहचाने जाते हैं. बचपन में ही मंदिर की झाड़ू लगाना, साधु-संतों की सेवा करना और भगवान के नाम में डूब जाना—ये उनका ‘डेली रूटीन’ था, न कि कोई वीकेंड प्लान.
13 साल की उम्र में घर छोड़ना कोई फिल्मी सीन नहीं था, बल्कि एक साइलेंट रिवोल्यूशन था. पिता से लिए तीन वचन—ना मांगेंगे, ना घर में रहेंगे, ना गृहस्थी में लौटेंगे—आज भी उनकी जिंदगी का संविधान हैं.
‘परम सुख’ किताब में क्या है खास?
पुस्तक ‘परम सुख’ के लेखक एवं संपादक श्री राधेकृष्ण और आईपीएस श्री घनश्याम चौरसिया ने बताया कि यह पुस्तक दो भागों में है। ‘परम सुख’ सिर्फ एक बायोग्राफी नहीं है, ये आध्यात्मिक Netflix सीरीज की तरह है—हर पेज पर नया ट्विस्ट. पहला भाग: जीवन यात्रा—कानपुर से काशी और फिर वृंदावन तक। दूसरा भाग: 400 उपदेश—जो सीधे दिल पर लगते हैं, बिना किसी फिल्टर के।
यह किताब आपको ‘ज्ञान’ नहीं देती, बल्कि आपके अंदर सवाल खड़े करती है—और वही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.
राष्ट्रपति से मुलाकात और चर्चा का विस्फोट
जब देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के अगले ही दिन किताब रिलीज होती है, तो मामला सिर्फ आध्यात्म नहीं रहता—यह नेशनल कन्वर्सेशन बन जाता है.
यह मुलाकात जैसे इस किताब के लिए ‘ब्लू टिक’ साबित हुई. अब हर कोई जानना चाहता है कि आखिर इस संत की सोच में ऐसा क्या है जो सत्ता के गलियारों तक गूंज रही है.

उपदेश जो सीधे दिमाग को झटका देते हैं
स्वामी प्रेमानंद जी के उपदेश कोई ‘मीठी बातें’ नहीं हैं. ये सीधे सिस्टम को हिलाते हैं:
- “मनुष्य जन्म सबसे बड़ा मौका है—इसे Netflix और Reels में मत गंवाओ.”
- “नाम जप ही सबसे सरल रास्ता है—बाकी सब जटिल गणित है.”
- “धर्मयुक्त कर्म ही असली कर्म है—बाकी सब सिर्फ व्यस्तता है.”
उनके शब्दों में मिठास कम, सच ज्यादा है—और यही आज के युवाओं को चुभता भी है और जगाता भी है.
युवाओं के लिए क्या मैसेज है?
आज का युवा ‘फास्ट रिजल्ट’ चाहता है—लेकिन स्वामी जी का मॉडल स्लो कुकिंग जैसा है. धैर्य, अनुशासन और संयम… ये तीनों मिलकर ही सफलता का स्वाद बनाते हैं.
उन्होंने साफ कहा, “प्रेम के नाम पर खुद को खोना नहीं, बल्कि खुद को पाना सीखो.”
आज के दौर में जहां ‘इन्फ्लुएंसर’ बनने के लिए रील्स बनानी पड़ती हैं, वहां एक संत बिना कैमरा ऑन किए लाखों लोगों को प्रभावित कर रहा है. यह कहानी सिर्फ भक्ति की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भी है जहां शोर ज्यादा है और सार कम. ‘परम सुख’ इस शोर में एक ऐसा शब्द है जो धीरे बोलता है, लेकिन दूर तक सुनाई देता है.
